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मायड़ भासा

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आजादी मिळ्यां पछै 30 मार्च 1949 रे दिन राजपुताना री सगळी रियासतां नै एकठ कर जिण राजस्थान प्रांत रौ गठण व्हियौ, उणरै साथै सगळां सूं म्होठी विडंबना रह्यी कै उणरा रैवास्यां नै आपरै काम-काज, विकास अर राज रै साथै संचार-संवाद सारू आपरी मायड़भासा (मातृभाषा) नै बरतण रौ इधकार अर सुविधा नीं हासल व्ही. वां नै आ समझावण री कोसीस करीजी कै शिक्षा, विकास अर राज-काज मांय आपरी भागीदारी बधावण सारू वां नै बेगी-सूं-बेगी उण संपरक भासा नै अंगीकार कर लेवणी चाईजै, जिणरौ राष्ट्रभासा रै रूप मांय पुरौ आव-आदर करै अर उण नै आगै बधावै, पण उणमांय वां री मायड़भासा कठै आड़ी आवै अर उणसूं विकास में कठै फांटौ पड़ै, इण बात रौ उथळौ वां नै किणी नीं दियौ. वांनै इण बात रौ ईं गाढौ अफसोस रह्यौ कै वां अंग्रेजी हकूमत अर देसी राजावां सूं लड़ती बगत अर आपरी जीवारी सारू जिण भासा माथै अथाग भरौसो राख्यौ - वांरौ इतिहास, संस्क्रती, रीत-रिवाज, साहित, गीत-संगीत, बिणज-बौपार अर चिट्टी-पत्री सगळौ-कीं परी उणी भासा मांय संज आवतौ, वा भासा आजादी मिळतां ईं रातू-रात राज री निजर मांय इत्ती अकारथ अर अणखावणी किण भांत व्हेगी? नुंवै राज री इण नीती रौ म्यानौ भला कुण बूझतौ अर किण सूं बूझतौ, जद फैसलौ लेवण वाळां मांय वां रा ई आगीवाण भेळौ हूंकार भरियौ व्है? राजस्थान री सगळी बोलियां रै रुप-गुणां रै मेळ सूं बण्योड़ी राजस्थानी भासा रै मानक सरूप रौ बैवार सन् 1857 री लड़ाई सूं ई मोकळा बरस पैली सूं अठा रै साहित अर कळा-रूपां मांय बखूबी देखण नै मिळै अर उणी मानक सरूप मांय लिख्योड़ै अथाग साहित अर दूजा कळा-रूप राजस्थानी री लूंठी विरासत मानिजै. उण विरासत माथै राज ई मोकौ आया घणौ गुमेज दरसावै पण उणरी मान्यता रौ सवाल सामी आवता ई जाणै क्यूं राज री सगळी कारवायां मौळी पड़ जावै. 
आजादी मिळ्यां पछै जिग्यां-जिग्यां टाबरां री स्कूलां खुली. हरेक हलकै अर टाबर आपरै घर-गवाड़ मांय मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ोती, वागड़ी, मेवाती, माळवी क ब्रज बोलता (ब्रज टाळ ए सगळी राजस्थानी री बोलीयां है, ज्यूं हरेक समर्थ भासा मांय व्हिया करै), पण स्कूली भणाई तौ हिन्दी-अग्रेजी मांय ई व्हैती, वांनै राजस्थानी रै मानक सरूप री ओळख कुण करावतौ? बड़ा स्हैरा मांय तौ स्कूलां टाळ हिन्दी नै ई कुण पुछै?
ऎड़ा हालात मांय जद प्रदेस री नुंवी पीढ़ी स्कूल-कोलेजां सूं बारै आय आपरौ आपौ संभाळियौ अर खुद री पिछाण बाबत विचार करणौ सरू कर्यौ तौ वा एक अजब दुविधा मांय पजगी. वांरौ समाजू ढांचौ, परिवेस, रीत-रिवाज सैं कि तौ मायड़ भासा मांय ही, पण राज-काज, भणतर अर खुद रै कमतर-करोबार स्सौ कीं हिन्दी कै अंग्रेजी मांय पार पड़तौ. जिका इणमें पैली सूं पारंगत हा अर ठायै री जिग्या माथै हा, वांरौ हाथ तौ उपर रैवणौ ई हौ, जिका कोशिस कर नै वा दियोड़ी भासा सिख लीवी, वै सीखण मांय कामयाब व्हिया पछै ई विकास अर संवाद रा मामला मांय आपरी राय मनावण जोगा कम ई मानीजिया. इणसूं भासा नै लेयर एक झिझक अर हिणताबोध मांय-ई-मांय बरसां पळतौ रह्यौ अर आगै चालर वौ अठै रै मिनखा रौ मांयलौ सुभाव बण्ग्यौ. इण प्रक्रिया सूं जिण लिखण-पढण वाळी पीढी रौ निरमाण व्हियौ उणरौ कन्नै आपरै मन री ओक्ता सारू नीं हिन्दी पूरसल पड़ी नीं राजस्थांनी, दूजी भासावां री बात ई कांई करीजै!
राजस्थानी कविता अठै री न्यारी-न्यारी रियासतां मांय चालती आजादी री लड़ाई रै जोड़ा-जोड़ जिण भांत जन जागरण रौ जिम्मौ संभाळ राख्यौ हौ, वा हिन्दी ई कांई सगळी भारतीय भासावां रै साम्ही एक ओपती मिशाल ही. बिसवी सदी रै दूजै दसक मांय जठै हिन्दी पौराणिक आख्यान, रूमानी छायावाद अर नुंवै छंद-विधान मांय आपरी पिछाण सोधण सारू आथड़ै ही, राजस्थानी भासा रौ साहित सिरै हौ.

 

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